बचपन से लेकर आज तक जब उम्र पकने लगी है छुक छुक करती रेलगाड़ी का आकर्षण ख़त्म नहीं हुआ है। समय के साथ में रेलगाड़ी में भी बदलाव आये और हमारी सोच और जरुरतों में भी। धुंआ उगलते इंजन अब बिजली से चलने वाले रूप में आ चुके हैं। हम भी बच्चे से प्रौढ़ हो चले हैं।
अक्सर इंजन के भीतर बैठे ड्राईवर को देखा करता था की किस तरह वो एक संत की भाँति सारी दुनिया के सुख-दुःख से निर्लिप्त रहता है उसे इस बात से कोई मतलब नहीं रहता की कोई किसी अपने से बिछुड़ रहा है या कोई दुल्हन अपने पिया से मिलने ससुराल जा रही है। कोई रो रहा है कोई हँस रहा है लेकिन इन सभी बातों से बिना कोई सरोकार रखे ड्राईवर तो बस समय होने और सिग्नल मिलने पर जोरदार आवाज़ में लोगों को सचेत करते हुए पों........ पों.... का होर्न बजा कर गाड़ी चला देता। लोग कुछ दूर तक अपनों के साथ खिड़की पर बतियाते हुए चलते रहते और फिर गति तेज़ हो जाने पर प्लेटफ़ॉर्म खड़े हाथ हिला कर विदा करते। ड्राईवर काका और उनका सहायक मजे से बैठे गार्ड साहब को झंडी दिखाते हुए चल देते।
मैं बच्चा सोचता था की क्या कभी ये ड्राईवर काका भी इसी तरह रेलगाड़ी में हम सब की तरह यात्री बन कर बैठते होंगे? क्या कभी इनकी भी गाड़ी छूट जाती होगी? अब इस बात का एहसास होता है की ड्राईवर भी हमारी ही तरह के साधारण इंसान होते हैं जिन्हें भूख प्यास भी लगा करती है और अपनों से बिछुड़ने का दुःख भी होता है, परिवार से मिलने की ख़ुशी भी होती है, उनके भी पत्नी बच्चे और माता-पिता होते हैं वे भी हमारी ही तरह इस देश के अत्यंत साधारण नागरिक होते हैं। इतना सब जान कर भी न जाने क्यों मुझे ड्राईवर काका बाकी सब लोगों से अलग ही दिखते हैं और मेरे मन के भीतर बसे बालक मन में उनके लिए एक विशेष जगह है।



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